आधे से ज़्यादा लोग 1 साल तक नहीं लेते मानसिक मदद! 13,825 लोगों की रिपोर्ट का चौंकाने वाला खुलासा — जानिए सबसे बड़ा कारण

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आधे से ज़्यादा लोग 1 साल तक नहीं लेते मानसिक मदद! 13,825 लोगों की रिपोर्ट का चौंकाने वाला खुलासा — जानिए सबसे बड़ा कारण
तस्वीर: Heart in Mind Psychotherapy और Reading Is Fundamental (RIF) के माध्यम से

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन मदद लेने में झिझक अब भी सबसे बड़ी दीवार बनी हुई है। मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट 2026 के मुताबिक आधे से ज़्यादा लोग एक साल से भी ज़्यादा समय तक पेशेवर मदद नहीं लेते। मेंटल हेल्थकेयर कंपनी अमाहा (Amaha) की इस रिपोर्ट में 13,825 लोगों के जवाब शामिल हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि मदद मिलने से पहले 56.2% लोगों के मन में सेल्फ-हार्म के ख्याल आए थे।

मानसिक स्वास्थ्य रिपोर्ट में छात्रों पर सबसे ज़्यादा असर

यह रिपोर्ट अक्टूबर 2025 से सितंबर 2026 के बीच केयर शुरू करने से पहले लोगों के दिए जवाबों पर आधारित है। इसके मुताबिक 53% लोग अपनी मानसिक परेशानी के साथ एक साल से ज़्यादा समय तक जीते रहे, जबकि सिर्फ 11.3% लोगों ने एक महीने के अंदर मदद ली। वहीं करीब 55% लोगों ने पेशेवर मदद से पहले दोस्तों या परिवार से बात की, और 44.6% ने सेल्फ-हेल्प के तरीके आज़माए। दरअसल, लगभग एक-तिहाई (32.9%) लोग पहले थेरेपी ले चुके थे और 19.4% को दवा भी दी गई थी। (पढ़ें: 41% भारतीयों के ‘हेल्थ डेट ट्रैप’ पर रिपोर्ट)

छात्रों और बेरोज़गार लोगों पर इसका असर सबसे ज़्यादा दिखा। मदद से पहले सेल्फ-हार्म के ख्याल छात्रों में 71.7% और बेरोज़गारों में 64.7% पाए गए, जबकि कामकाजी लोगों में यह आंकड़ा 53.2% था। वहीं महिलाओं में मदद में देरी के दौरान ऐसे ख्याल पुरुषों (29.4%) की तुलना में ज़्यादा (40.5%) देखे गए। इसके अलावा 15.4% लोगों ने मदद लेने से पहले शराब या अन्य हानिकारक पदार्थों का सहारा लिया।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 94.9% लोगों को एक साथ दो या उससे ज़्यादा मानसिक परेशानियां थीं, और औसतन हर व्यक्ति ने पांच चिंताएं बताईं। सबसे आम परेशानी एंग्जायटी (72.1%) रही, इसके बाद स्ट्रेस (67.5%), लो मूड (58.3%), रिश्तों में दिक्कतें (55.6%) और बार-बार मूड बदलना (54.1%) शामिल हैं। हालांकि 82.7% लोगों ने ज़्यादा स्क्रीन टाइम, ज़्यादा सोना या ज़्यादा काम जैसे बचाव वाले तरीके अपनाए, वहीं सिर्फ 43.1% ने व्यायाम या जर्नलिंग जैसे सकारात्मक तरीके चुने। (स्रोत: PTI/द प्रिंट)

अमाहा के संस्थापक और सीईओ डॉ. अमित मलिक का कहना है कि भारत की मानसिक स्वास्थ्य प्रगति को इस बात से आंका जाना चाहिए कि लोगों को समय पर प्रभावी इलाज मिल पा रहा है या नहीं, न कि सिर्फ इस बात से कि हम इस पर कितनी खुलकर बात करते हैं। उन्होंने दोस्तों, परिवार और समुदाय की भूमिका को बेहद अहम बताया। अगर आप या आपका कोई जानने वाला ऐसी परेशानी से गुज़र रहा है, तो देर न करें — समय पर पेशेवर मदद लें; सरकार की टेली-मानस हेल्पलाइन 14416 पर भी संपर्क किया जा सकता है।

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