क्या पेट की सेहत सीधे दिमाग के तनाव से जुड़ी है? वैज्ञानिकों ने लंबे समय से गट ब्रेन एक्सिस पर सवाल उठाए हैं, और अब अमेरिका में इस पर अब तक का सबसे बड़ा ट्रायल शुरू हो रहा है। बायोटेक कंपनी Holobiome और हेल्थटेक फर्म Radicle Science ने GUT-FEELINGS नाम की दो साल की रिसर्च पहल का ऐलान किया है, जिसमें 6,000 से ज्यादा अमेरिकी हिस्सा लेंगे और इसके शुरुआती नतीजे 2027 के दूसरे हिस्से में आएंगे।
गट ब्रेन एक्सिस ट्रायल में क्या होगा?
यह ट्रायल दो चरणों में होगा, जिसमें भोजन से बने 19 अलग-अलग प्रीबायोटिक फॉर्मूलों का प्लेसिबो के मुकाबले परीक्षण किया जाएगा। 16 सप्ताह के इस अध्ययन में एंजायटी की भावना वाले प्रतिभागियों को या तो प्रीबायोटिक मिलेगा या प्लेसिबो। शोधकर्ता एंजायटी के साथ तनाव, मूड, नींद, जीवन की गुणवत्ता, वजन, कमर के माप और खान-पान पर भी असर मापेंगे।
इस ट्रायल का पैमाना अभूतपूर्व है — 24,000 से ज्यादा मल के नमूने और 12,000 खून के नमूने जुटाए जाएंगे। इसके साथ माइक्रोबायोम सीक्वेंसिंग, मेटाबोलोमिक्स, ब्लड प्रोटियोमिक्स, वियरेबल डेटा और ग्लूकोज मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होगा, ताकि पता चले कौन सा फॉर्मूला किसके लिए सबसे असरदार है।
फंडिंग और बड़ी वजह
इस पहल को अमेरिकी सरकार की हेल्थ रिसर्च एजेंसी ARPA-H से फंड मिला है, जो इसे मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित EVIDENT पहल का हिस्सा बनाता है। दरअसल, यह ट्रायल दवा के एक परीक्षण से कहीं आगे की सोच है। Holobiome के CEO Philip Strandwitz का कहना है कि माइक्रोबायोम मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद अहम है, लेकिन अभी तक बड़े पैमाने का इंटरवेंशनल डेटा हमारे पास नहीं था।
वहीं, Radicle Science के को-फाउंडर्स का मानना है कि अब तक क्लिनिकल रिसर्च उत्पाद बनने के बाद उसे साबित करने में इस्तेमाल होती रही है — उनका लक्ष्य इस मॉडल को उल्टा करना है: पहले सख्त मानव प्रमाण, फिर बेहतर फॉर्मूलेशन। सारा डेटा Holobiome के Mercator फाउंडेशन मॉडल में जाएगा, जो पेट और दिमाग के रिश्ते को समझने में मदद करेगा।
भारत के पाठकों के लिए क्या मायने?
यह ट्रायल अमेरिकियों पर होगा, लेकिन इसके नतीजे वैश्विक होंगे। अगर प्रीबायोटिक से एंजायटी कम होना साबित हुआ, तो भविष्य में बिना डॉक्टर के पर्चे वाले समाधान भी आ सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर पहले के शोध भी नींद-तनाव के रिश्ते को उजागर कर चुके हैं, और यह अध्ययन उस कड़ी को और मजबूत कर सकता है।
हालांकि, यह शोध अभी शुरुआत है — इसका मकसद तत्काल इलाज बेचना नहीं है। शोधकर्ता पहले समझना चाहते हैं कि पेट के बैक्टीरिया दिमाग की सेहत को कैसे प्रभावित करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अंतिम नतीजों के बाद ही पता चलेगा कि ‘पेट से दिमाग तक’ का यह सफर एंजायटी का नया इलाज बन पाएगा या नहीं।






