पेट भरा है, फिर भी दिमाग़ में खाने का शोर! जानिए क्या है ‘फूड नॉयज’

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पेट भरा है, फिर भी दिमाग़ में खाने का शोर! जानिए क्या है ‘फूड नॉयज’
कोलाज तस्वीर: बाईं ओर महिला की तस्वीर (न्यूट्रोलॉजी एकेडमी) और दाईं ओर खाने की तस्वीर (हेल्दी इनबॉक्स/शटरस्टॉक) — स्रोतों के श्रेय के साथ।

सोने से पहले फ्रिज खोलकर झांक लेना, लंच के एक घंटे बाद ही डिनर की प्लानिंग — पेट भरा होने पर भी अगर दिमाग़ में खाने के ख्याल घूमते हैं, तो इसका नाम है फूड नॉयज। पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 1,000 लोगों के सर्वे में पाया कि हर 5 में से 1 वयस्क अक्सर या हमेशा इस लगातार खाने के शोर से जूझता है। आधे से ज़्यादा लोगों ने माना कि उन्हें कभी-कभी ऐसी ही भावना होती है। ये स्टडी जर्नल ‘ओबेसिटी साइंस एंड प्रैक्टिस’ में प्रकाशित हुई है।

फूड नॉयज का सबसे बड़ा शिकार कौन है

सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा महिलाओं और युवाओं को लेकर आया है। महिलाओं में 22.7 प्रतिशत ने बार-बार फूड नॉयज का अनुभव बताया, जबकि पुरुषों में ये 12.7 प्रतिशत रहा। वहीं 30 से कम उम्र वालों में 26.5 प्रतिशत लोग इससे जूझते हैं, जबकि 60 से ऊपर ये घटकर 13.5 प्रतिशत रह जाता है। इसका सबसे मज़बूत संबंध खाने पर काबू खोने के एहसास से है — खाते समय खुद को न रोक पाने वालों में फूड नॉयज का खतरा करीब 6 गुना ज़्यादा देखा गया।

दरअसल, ये शब्द पहली बार 2023 में सोशल मीडिया पर चर्चित हुआ था, हालांकि अभी इसकी कोई सर्वमान्य वैज्ञानिक परिभाषा तय नहीं हुई है। ऐसे लोगों ने अपनी डाइट की गुणवत्ता खराब रेट की और उनका मानसिक स्वास्थ्य भी कमजोर पाया गया। वहीं मोटापा कम करने वाली GLP-1 दवाओं के इस्तेमाल से भी इसका जुड़ाव देखा गया। हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ किया कि ये दवाओं का असर नहीं है — दवा लेने वाले लोग पहले से खाने के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं, इसलिए लंबी स्टडी ज़रूरी है।

सामान्य भूख और फूड नॉयज में क्या फर्क है

विशेषज्ञों के मुताबिक भूख शरीर की असली ज़रूरत है, जबकि फूड नॉयज दिमाग़ की लगातार चख़चख़ाहट है जो काम, नींद और परिवार के साथ समय से भी ध्यान भटकाती है। वहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि इसे अलग बीमारी मानने से पहले और गहन वैज्ञानिक पुष्टि ज़रूरी है। हालांकि, इस विषय में लोगों की गहरी रुचि दिखाती है कि ये सिर्फ कमज़ोर इच्छाशक्ति का मामला नहीं है, बल्कि एक गंभीर मुद्दा हो सकता है। ऐसे में नियमित रूटीन, भरपूर नींद और खाने पर काबू खोने के पैटर्न को पहचानना मददगार हो सकता है।

अगर आपके पेट और दिमाग़ के बीच भी लगातार रस्साकशी चलती है, तो इससे जुड़ी गट-ब्रेन कनेक्शन की नई स्टडी आपके लिए दिलचस्प होगी। डॉक्टरों की सलाह है कि खाने के ख्याल से परेशान लोग खुद को दोष देने के बजाय इस पैटर्न को समझें और ज़रूरत पड़ने पर पोषण विशेषज्ञ से बात करें। विदेशी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ये खोज मोटापे की दवाओं से जुड़ी चर्चाओं में भी अहम भूमिका निभा रही है।

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