बच्चों के कैंसर पर AIIMS की बड़ी उम्मीद! 5 साल में बदल जाएगी ये तस्वीर — जानें क्या कहा एक्सपर्ट ने

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बच्चों के कैंसर पर AIIMS की बड़ी उम्मीद! 5 साल में बदल जाएगी ये तस्वीर — जानें क्या कहा एक्सपर्ट ने
एम्स नई दिल्ली (पीटीआई फोटो/आजतक) और अस्पताल में बच्ची के इलाज की सांकेतिक तस्वीर (इंडिया टीवी)। खबर: टेन न्यूज़/लोकमत टाइम्स।

देश में बच्चों का कैंसर अब सिर्फ एक मेडिकल चुनौती नहीं, बल्कि एक ऐसा मुद्दा बन गया है जिस पर बेहतर आंकड़ों और रिसर्च की सबसे ज्यादा जरूरत है। टेन न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक मोहाली में शनिवार 24 अक्टूबर को शुरू हुए पीडियाट्रिक हिमेटोलॉजी ऑन्कोलॉजी सपोर्ट सर्विसेज़ सम्मेलन (PHOSSCON 2026) में एम्स नई दिल्ली के विशेषज्ञों ने इस दिशा में उम्मीद जगाने वाली तस्वीर पेश की। हालांकि अभी भी बच्चों के कैंसर से जुड़े आंकड़ों की कमी एक बड़ी चुनौती है, लेकिन पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में हुई प्रगति ने हालात को काफी बदला है।

एम्स नई दिल्ली में मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर समीर बख्शी ने बताया कि आज हमारे पास बच्चों के कैंसर के बारे में जितनी जानकारी है, उसका तीन-चौथाई हिस्सा पिछले 10 सालों में ही सामने आया है। उन्होंने कहा कि अगर पिछले तीन दशकों के आंकड़ों को एक सीधी रेखा माना जाए, तो अगले पांच सालों में यह ग्राफ तेजी से ऊपर जाएगा। दरअसल, उनकी टीम ने तीन दशकों के भारतीय आंकड़ों को एक साथ जोड़कर 182 अध्ययनों और 22,886 बच्चों के अनुभवों पर आधारित एक अहम रिसर्च तैयार की है।

बच्चों का कैंसर: 2030 तक 60 फीसदी सर्वाइवल का लक्ष्य

इस सम्मेलन की आयोजन अध्यक्ष और इस अध्ययन की सह-लेखिका पूनम बगई ने बताया कि यह नतीजे संयुक्त राष्ट्र महासभा के 80वें सत्र के उस प्रस्ताव की दिशा में अहम हैं, जिसमें 2030 तक बच्चों के कैंसर में 60 फीसदी से ज्यादा सर्वाइवल का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद उन्होंने कहा कि बेहतर आंकड़े ही यह बताएंगे कि देश इस लक्ष्य की ओर कितनी तेजी से बढ़ रहा है और कहां और मेहनत की जरूरत है। वहीं पंजाब सरकार के उद्देश्यों के साथ तालमेल बिठाते हुए यह दो दिवसीय सम्मेलन मोहाली के भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) में आयोजित हो रहा है, जहां देश भर के विशेषज्ञ इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं।

हालांकि आंकड़ों की कमी लंबे समय से इस लड़ाई की सबसे बड़ी कमजोरी रही है, लेकिन अब रिसर्च का बढ़ता दायरा इस कमजोरी को दूर करने की ओर बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब हर बच्चे के इलाज का रिकॉर्ड व्यवस्थित तरीके से दर्ज होगा, तभी यह पता चलेगा कि कौन सा इलाज कहां कितना कारगर रहा। इसके बाद स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के फैसले भी आंकड़ों की बुनियाद पर लिए जा सकेंगे, न कि अंदाज़े पर। स्वास्थ्य से जुड़ी ऐसी ही एक हालिया रिसर्च में 50 की उम्र के बाद हड्डियों की कमजोरी पर भी चौंकाने वाले नतीजे सामने आए थे, जिनकी पूरी खबर यहां पढ़ी जा सकती है।

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