फ्री में मिला सेहतमंद खाना, 3 साल में घटा ब्लड प्रेशर! फूड इज मेडिसिन रिसर्च

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फ्री में मिला सेहतमंद खाना, 3 साल में घटा ब्लड प्रेशर! फूड इज मेडिसिन रिसर्च
फूड इज मेडिसिन अध्ययन में प्रतिभागियों को ताजे फल-सब्जियां, दालें और नट बटर के साप्ताहिक ग्रॉसरी बॉक्स मिले। (प्रतीकात्मक तस्वीरें: Whole Foods Co-op / Voyage Ohio)

अगर सेहतमंद खाना दवा की तरह हर हफ्ते मुफ्त में घर पहुंच जाए, तो सालों बाद सेहत पर इसका क्या असर होगा? इस सवाल का जवाब अमेरिका में हुई एक लंबी स्टडी से मिला है, जिसे फूड इज मेडिसिन प्रोग्राम के नाम से जाना जा रहा है। शोधकर्ताओं ने बोस्टन के एक कम्युनिटी हेल्थ सेंटर के फूड पेंट्री से जुड़े 68 वयस्कों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का विश्लेषण किया, जिन्हें औसतन 2.7 साल तक हर हफ्ते पौधों पर आधारित ग्रॉसरी के पैकेज मिलते रहे। यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल ‘प्रिवेंटिंग क्रॉनिक डिजीज’ के अक्टूबर 2026 अंक में प्रकाशित हुआ है।

इन पैकेजों को एक रजिस्टर्ड डाइटीशियन ने आहार गाइडलाइंस के मुताबिक डिजाइन किया था। हर थैले में ताजे फल और सब्जियां, डिब्बाबंद राजमा जैसी दालें, नट बटर और साबुत अनाज शामिल होते थे। हर पैकेज में घर के हर सदस्य के लिए हफ्ते भर के तीनों समय के भोजन के लायक खाना होता था। हालांकि प्रतिभागी जितनी बार चाहते, उतनी बार आकर ये पैकेज ले सकते थे, लेकिन औसतन हर व्यक्ति को करीब 97 बॉक्स मिले।

नतीजे हैरान करने वाले रहे, क्योंकि फायदा सीधे खाए गए पैकेजों की संख्या से जुड़ा था। हर 100 पैकेज पर लोगों के डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर में औसतन 3.21 mmHg की गिरावट, वजन में लगभग 2.6 किलो की कमी और बीएमआई में करीब 1.04 अंक की कटौती देखी गई। वहीं जिन प्रतिभागियों का ब्लड प्रेशर पहले से ही ऊंचा था, उनमें सिस्टोलिक प्रेशर में भी कमी दर्ज हुई। हालांकि, यहां एक ईमानदार बात भी सामने आई — हीमोग्लोबिन A1c में कोई खास सुधार नहीं देखा गया।

फूड इज मेडिसिन: छोटी रिसर्च से बड़ा सबक

दरअसल, फूड इज मेडिसिन पर हुई ज्यादातर पुरानी स्टडीज सिर्फ हफ्तों या महीनों तक चली थीं, इसलिए लंबी अवधि का असर अनजाना था। वहीं इस बार सालों तक चली स्टडी ने साबित किया कि लंबे समय तक लगातार सेहतमंद खाना पहुंचना दिल और मेटाबोलिक सेहत के लिए वाकई फायदेमंद हो सकता है। अध्ययन की वरिष्ठ लेखक डॉ. लॉरेन फीच्टनर का मानना है कि पौधों पर आधारित खाने की पहलें उम्मीद जगाती हैं और इन्हें लंबी अवधि पर फोकस करना चाहिए। इसके अलावा सेहतमंद खाने से जुड़े एक और अध्ययन के बारे में भी विस्तार से पढ़ा जा सकता है।

अब सवाल है कि भारत के पाठकों के लिए इसका क्या मतलब है। साफ है कि बोस्टन का यह कार्यक्रम हमारे लिए उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसका मूल सिद्धांत सार्वभौमिक है — खाना ही दवा है। हमारी थाली में पहले से फल, सब्जियां, साबुत अनाज और दालें हैं, बस इन्हें नियमित खाना ही असली चुनौती है। इस रिसर्च की पूरी जानकारी मूल रिपोर्ट में भी पढ़ी जा सकती है।

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