खाने का परहेज काफी नहीं! डायबिटीज-हार्ट का असली दुश्मन है ‘अदृश्य’ प्रदूषण — लैंसेट स्टडी का खुलासा

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खाने का परहेज काफी नहीं! डायबिटीज-हार्ट का असली दुश्मन है ‘अदृश्य’ प्रदूषण — लैंसेट स्टडी का खुलासा
तस्वीर: इंडिया टीवी न्यूज/WHO (प्रतीकात्मक)

आप खाना-पीना संभलकर खाते हैं, रोज टहलते भी हैं, फिर भी शुगर या दिल की बीमारी का खतरा बना रहता है? दरअसल, इस सवाल का जवाब अब एक नई लैंसेट स्टडी में मिला है, जिसमें प्रदूषण और डायबिटीज के बीच गहरा कनेक्शन सामने आया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक सिर्फ ज्यादा खाना और कम हिलना-डुलना ही इसकी वजह नहीं है। इसके पीछे एक ‘अदृश्य दुश्मन’ भी काम कर रहा है, जिसे वैज्ञानिक ‘एक्सपोज़ोम’ कह रहे हैं।

‘एक्सपोज़ोम’ का मतलब है व्यक्ति के जीवनभर के सभी पर्यावरणीय एक्सपोजर का कुल जोड़, यानी वह सब कुछ जो हम सांस में लेते हैं, खाते हैं और छूते हैं। यह पेपर ‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ – साउथईस्ट एशिया’ में प्रकाशित हुआ है, जिसे मेरठ के सुभारती मेडिकल कॉलेज के यशेंद्र सेठी और दिल्ली के फोर्टिस सी-डॉक के डॉ. अनूप मिश्रा ने लिखा है। डॉ. मिश्रा कहते हैं कि सिर्फ ज्यादा कैलोरी और कम एक्टिविटी इस महामारी को समझा नहीं सकती, इसलिए अब ‘मॉडर्न एक्सपोज़ोम’ को पहचानना जरूरी हो गया है। हालांकि यह समीक्षात्मक पेपर है, लेकिन इसके साक्ष्य गंभीर चेतावनी देते हैं।

अध्ययन के मुताबिक PM2.5 जैसे महीन कण खून में घुसकर इंसुलिन रेजिस्टेंस, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और खून की नलियों की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। बिसफेनॉल, थैलेट्स और PFAS जैसे केमिकल हार्मोन और इंसुलिन संवेदनशीलता में दखल देते हैं। ये केमिकल रोजमर्रा के घरेलू और औद्योगिक उत्पादों में पाए जाते हैं। वहीं ये सभी एक्सपोजर मिलकर शरीर में लंबे समय तक हल्की सूजन पैदा करते हैं, जो इन बीमारियों की जड़ है।

प्रदूषण और डायबिटीज: बचाव के लिए क्या कहती है स्टडी

नींद की कमी, शिफ्ट में काम, अनियमित खानपान और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड भी इस खतरे को बढ़ाते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार जलवायु से जुड़ा तनाव और मानसिक तनाव भी मेटाबॉलिक सेहत बिगाड़ते हैं, साथ ही ये एक्सपोजर आंत के माइक्रोबायोम को भी प्रभावित करते हैं। इसी वजह से दक्षिण एशियाई लोगों में टाइप 2 डायबिटीज, फैटी लिवर और धमनियों की बीमारी कम उम्र में ही दिखने लगी है। दरअसल, हमारी ‘थिन-फैट’ शारीरिक बनावट पर प्रदूषण का असर और भी गहरा पड़ता है।

अच्छी खबर यह है कि लेखक सिर्फ डराते नहीं, बल्कि समाधान भी बताते हैं — रोकथाम अब सिर्फ ‘हेल्दी खाओ, एक्सरसाइज करो’ तक सीमित नहीं रह सकती। उनका कहना है कि सरकारों, पर्यावरण एजेंसियों, फूड रेगुलेटर्स और मेडिकल सिस्टम को मिलकर निगरानी, बचपन से हस्तक्षेप और लंबे शोध पर काम करना होगा। हालांकि व्यक्तिगत स्तर पर संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और पूरी नींद अब भी बेहद जरूरी है, जैसा कि दिल की सेहत पर हमारी पिछली स्टडी में भी बताया गया था। वहीं Firstpost पर इस पूरे शोध का विस्तृत विश्लेषण पढ़ा जा सकता है।

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