रोज़ का ये खाना बढ़ा रहा है कोलेस्ट्रॉल! रिसर्च में सामने आई बड़ी वजह

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रोज़ का ये खाना बढ़ा रहा है कोलेस्ट्रॉल! रिसर्च में सामने आई बड़ी वजह
फोटो: Pexels (फ्री लाइसेंस); कोलाज: TheFocusWorld

कोलेस्ट्रॉल जीन स्टडी में एक ऐसा खुलासा हुआ है जो हर भारतीय के लिए चौंकाने वाला है। हमारी रोज़ की थाली में सजे सफेद चावल, मैदा और रिफाइंड आटे से बना खाना उन लोगों के लिए ज्यादा खतरनाक हो सकता है जिनके जीन में डायबिटीज़ और कोलेस्ट्रॉल का खतरा छिपा है। दरअसल, शोधकर्ताओं का कहना है कि जीन अपने आप में तकदीर नहीं लिखते, लेकिन गलत डाइट के साथ मिलकर वे खून में कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने का काम जरूर कर देते हैं।

यह रिसर्च 14 अक्टूबर 2026 को प्रतिष्ठित जर्नल PLOS One में प्रकाशित हुई है, जिसे ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग और चेन्नई के मद्रास डायबिटीज़ रिसर्च फाउंडेशन के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया। शोध में चेन्नई के 1,020 वयस्कों के जेनेटिक डेटा और खान-पान की आदतों का विश्लेषण किया गया। हालांकि, यह ऑब्जर्वेशनल स्टडी कारण और प्रभाव को पूरी तरह साबित नहीं करती, फिर भी इसका सैंपल साइज़ और डिज़ाइन काफी मज़बूत माने जा रहे हैं।

कोलेस्ट्रॉल जीन स्टडी में क्या पाया गया

शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों में डायबिटीज़ से जुड़े जेनेटिक वेरिएंट थे, उनमें कोलेस्ट्रॉल का स्तर तब ज्यादा बढ़ा जब उनकी डाइट में फल, सब्जियां, बीन्स और दालें कम थीं। वहीं, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट — यानी सफेद चावल और मैदा — ज्यादा खाने वालों में यह असर और तेज़ दिखा। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर विमल करणी के मुताबिक, बहुत से लोग अनजाने में ऐसे जीन लेकर चलते हैं जो खराब डाइट के साथ मिलकर नुकसान पहुंचाते हैं।

रिसर्च यह भी रेखांकित करती है कि भारत में खान-पान तेज़ी से बदल रहा है, जहां फाइबर वाले पारंपरिक खाने की जगह सफेद चावल, मैदा और प्रोसेस्ड फूड ने ले ली है। शोधकर्ताओं के अनुसार, शहरीकरण के साथ आई यह डाइट उन लोगों के लिए दोगुना जोखिम बन गई है जो जन्म से ही जेनेटिक रूप से संवेदनशील हैं। इसके बाद भी अच्छी खबर यह है कि यह जोखिम पत्थर की लकीर नहीं है — सही डाइट से इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है।

भारतीयों के लिए क्या है सबक

विशेषज्ञों की सलाह साफ है: थाली में फल, हरी सब्जियां और दालों की मात्रा बढ़ाएं और सफेद चावल व मैदे पर निर्भरता घटाएं। दरअसल, जेनेटिक टेस्ट हर किसी के लिए अभी आम बात नहीं है, इसलिए सबसे सुरक्षित रास्ता यही है कि डाइट की क्वालिटी सुधार ली जाए। बहरहाल, यह अध्ययन सिर्फ चेन्नई के शहरी लोगों पर हुआ है, पूरे भारत पर नहीं, इसलिए नतीजों को आखिरी सच मानने से पहले यह सीमा याद रखें। खान-पान से जुड़ी और खबरों के लिए आप हमारी फूड नॉयज पर यह खास रिपोर्ट भी पढ़ सकते हैं।

(स्रोत: Medical Dialogues / PLOS One, 14 अक्टूबर 2026)

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