फास्ट फूड को ‘हेल्दी’ समझ रहे शिलांग के युवा! 300 छात्रों पर हुई स्टडी का चौंकाने वाला नतीजा

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फास्ट फूड को ‘हेल्दी’ समझ रहे शिलांग के युवा! 300 छात्रों पर हुई स्टडी का चौंकाने वाला नतीजा
फोटो: बाएं — फास्ट फूड रेस्तरां में युवा (प्रतीकात्मक तस्वीर, iStock/buxtonco.com); दाएं — पारंपरिक खासी व्यंजन (travel.com)। कोलाज: द फोकस वर्ल्ड।

शिलांग: शिलांग में कॉलेज के युवाओं के खाने की आदतों पर हुई एक नई स्टडी ने चिंताजनक तस्वीर पेश की है। सेंट मैरी कॉलेज की शोधकर्ता मंडारी मैरी ब्लाह ने 18 से 24 साल के 150 पुरुष और 150 महिला खासी छात्रों पर अध्ययन किया, जो अक्टूबर 2026 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन एंड पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित हुआ। सबसे हैरान करने वाला नतीजा रहा कि सर्वे में शामिल लगभग आधी युवा महिलाओं ने फास्ट फूड को सेहतमंद माना। यानी फास्ट फूड खतरा अब युवाओं की नज़र में खतरा ही नहीं रह गया है।

शोध के मुताबिक शिलांग में कमर्शियल फास्ट फूड ने युवाओं के बीच गहरी पैठ बना ली है, जबकि पारंपरिक खासी आहार लगातार पीछे छूट रहा है। पीढ़ियों से खासी थाली स्थानीय सब्जियों, जंगली पौधों, स्वदेशी फलों और बिना पॉलिश चावल पर टिकी रही है। लेकिन अब जामिरदोह, जाउत और ख्लेइन सियार जैसे पारंपरिक खाद्य स्नैक्स और सुविधा खाद्य पदार्थों से बदलते जा रहे हैं। अध्ययन इस बदलाव को शिलांग की बढ़ती डाइन-आउट संस्कृति और कमर्शियल फूड आउटलेट्स से जोड़ता है।

फास्ट फूड खतरा: मेटाबॉलिक बीमारियों के आंकड़े बढ़े

युवाओं की बदलती पसंद के पीछे ईस्ट खासी हिल्स जिले के क्लिनिकल डेटा भी चिंता बढ़ाते हैं। शोधकर्ता ने जिले के एनसीडी सेल के 75,673 मरीज़ों के रिकॉर्ड (2019-2022) का विश्लेषण किया, जिसमें डायबिटीज की दर 4.04 प्रतिशत और हाइपरटेंशन की दर 8.23 प्रतिशत दर्ज हुई। ये पुराने बेसलाइन से तेज़ उछाल है — 2003-2007 के ऑडिट में शहरी खासी लोगों में डायबिटीज प्रिवैलेंस 9.89 प्रतिशत थी, जो तब ज़्यादातर 40 से अधिक उम्र के लोगों तक सीमित थी। वहीं अब मेटाबॉलिक बीमारियां सभी आयुवर्गों में फैल रही हैं। खानपान और कोलेस्ट्रॉल के रिश्ते पर हाल की एक चेन्नई स्टडी भी यही संकेत देती है कि रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट वाला आहार जोखिम बढ़ा रहा है।

हालांकि अध्ययन का सबसे गहरा संदेश युवाओं की सोच से जुड़ा है। सर्वे में कई छात्रों ने फास्ट फूड को स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा ही नहीं माना, और स्वाद भोजन के चुनाव का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा। इसके बाद सुविधा, दोस्तों का साथ और विज्ञापन भी महत्वपूर्ण कारक रहे। शोधकर्ता का कहना है कि जब युवा ही जोखिम को जोखिम न समझें, तो जागरूकता अभियानों को सबसे पहले इसी भ्रम को तोड़ना ज़रूरी होगा।

दरअसल यह एक अवलोकनात्मक अध्ययन है — यह फास्ट फूड और बीमारियों के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध साबित नहीं करता, बल्कि आदतों और धारणाओं के पैटर्न को उजागर करता है। इसलिए नतीजों को सावधानी से समझना चाहिए। विस्तृत रिपोर्ट हब नेटवर्क पर पढ़ी जा सकती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि युवाओं को पारंपरिक फाइबर-युक्त आहार, स्थानीय सब्जियों और फलों की ओर लौटना चाहिए — स्वाद के साथ सेहत का संतुलन ही लंबी उम्र की कुंजी है।

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