सिगरेट नहीं, गुटखा-खैनी है मुंह के कैंसर की सबसे बड़ी वजह! पुरुषों में 57% केस की जड़ सामने

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सिगरेट नहीं, गुटखा-खैनी है मुंह के कैंसर की सबसे बड़ी वजह! पुरुषों में 57% केस की जड़ सामने
फोटो: Sanskriti Magazine / STV News Rajasthan (प्रतीकात्मक)

नई स्टडी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं, क्योंकि तंबाकू से कैंसर का रिश्ता अब और भी गहरा साबित हो रहा है। एक नई रिसर्च के मुताबिक, सिगरेट-बीड़ी से ज्यादा खतरा अब धूम्ररहित तंबाकू यानी गुटखा, खैनी और पान मसाला से है।

रिसर्च के अनुमानों के मुताबिक, पुरुषों में मुंह के कैंसर के 57.3 प्रतिशत मामलों के लिए स्मोकलेस टोबैको जिम्मेदार है। जबकि महिलाओं में किसी भी रूप के तंबाकू से होने वाले मुंह के कैंसर का अनुमानित आंकड़ा 73.4 प्रतिशत तक पहुंचता है। इसका मतलब यह है कि अगर तंबाकू के संपर्क को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए, तो सिर और गर्दन के कैंसर के एक बड़े हिस्से को रोका जा सकता है। वहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि तंबाकू का खतरा क्षेत्र, लिंग और उत्पाद के हिसाब से काफी अलग-अलग है।

स्टडी की एक और दिलचस्प खोज यह है कि पिछले पांच सालों में व्यक्तिगत तंबाकू उपयोग में कमी आई है, लेकिन एक दशक पहले की तुलना में तंबाकू खरीदने वाले घरों की संख्या बढ़ी है। सरकारी वर्किंग पेपर के मुताबिक खासतौर पर गुटखे की खरीद में इज़ाफा देखा गया है। इसके बाद शोधकर्ताओं ने चेताया है कि यह विरोधाभासी ट्रेंड जनस्वास्थ्य के लिए नई चुनौती है, इसलिए लक्षित तंबाकू नियंत्रण नीतियों की सख्त ज़रूरत है।

तंबाकू से कैंसर: उत्तराखंड के आंकड़े और ICMR की स्टडी

इसी मुद्दे पर आईसीएमआर की एक और स्टडी ETV Bharat की रिपोर्ट में सामने आई है, जो 8 अक्टूबर को इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित हुई थी। इस शोध में 2019-2024 के दौरान 1,12,085 कैंसर मरीजों के डेटा का विश्लेषण किया गया। उत्तराखंड के आंकड़ों के मुताबिक पुरुषों में स्मोकलेस टोबैको होंठ के कैंसर के 53.68%, जीभ के 24.1% और ओरल कैंसर के 49.02% मामलों के लिए जिम्मेदार पाया गया। जबकि महिलाओं में यही आंकड़े क्रमशः 36.94%, 6.91% और 36.12% रहे।

दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। डॉ. दौलत सिंह के मुताबिक, 60 से 65 प्रतिशत कैंसर मरीज किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं, जिनमें से करीब 35 प्रतिशत ओरल कैंसर से पीड़ित हैं। तंबाकू के दुष्प्रभावों को लेकर लोगों में जागरूकता की भारी कमी है। उत्तराखंड सरकार के प्रतिबंध के बावजूद विशेषज्ञ जागरूकता को ही असली हथियार मानते हैं।

कुल मिलाकर दोनों स्टडीज़ एक ही संदेश देती हैं — धूम्ररहित तंबाकू को सिगरेट से कम खतरनाक समझने का भ्रम न पालें। अगर आप सेहत से जुड़ी रिसर्च में दिलचस्पी रखते हैं, तो बचपन की दवा और पेट की बीमारी पर हमारी यह स्टोरी भी पढ़ें। दरअसल अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूक रहना ही सबसे बड़ी सुरक्षा है, और तंबाकू से दूरी बनाना इसमें सबसे पहला कदम होना चाहिए।

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