सफेद चावल और मैदे के पराठे खाने वालों के लिए एक नई स्टडी चेतावनी लेकर आई है। चेन्नई और ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने 1,020 लोगों पर शोध करके पाया कि खराब डाइट और शरीर के कुछ जीन मिलकर खून में कोलेस्ट्रॉल बढ़ा देते हैं। हालांकि अच्छी खबर यह है कि सेहतमंद थाली खाने वालों पर इन जीनों का बुरा असर लगभग नगण्य रह जाता है। यानी कोलेस्ट्रॉल डाइट जीन की इस तिकड़ी में सबसे भारी पलड़ा आपकी थाली का ही है।
यह शोध मद्रास डायबिटीज़ रिसर्च फाउंडेशन (चेन्नई) और यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग (ब्रिटेन) के वैज्ञानिकों ने किया है, और यह 14 अक्टूबर 2026 को जर्नल PLOS One में प्रकाशित हुआ। इसमें 25 से 80 साल के 452 पुरुष और 568 महिलाएं शामिल थीं, जिनका डेटा चेन्नई अर्बन रूरल एपिडेमियोलॉजी स्टडी (CURES) से लिया गया। वहीं शोधकर्ताओं ने TCF7L2 और FTO नाम के दो जीनों के तीन वेरिएंट देखे, जो डायबिटीज़ और मेटाबॉलिक समस्याओं से जुड़े माने जाते हैं।
कोलेस्ट्रॉल डाइट जीन: अच्छी थाली ने खतरे को किया कम
टीम ने हर प्रतिभागी की डाइट को इंडियन डाइट क्वालिटी स्कोर पर आंका, जिसमें आठ श्रेणियां थीं — दालें, फलियां, डेयरी, फल, सब्जियां, रिफाइंड कार्ब्स, चीनी और फैट। जिनकी डाइट सबसे खराब थी, उनमें ज्यादा जोखिम वाले जीन रखने वालों का टोटल और LDL कोलेस्ट्रॉल काफी ऊंचा पाया गया। वहीं मध्यम या अच्छी डाइट वालों में जीन का यह असर सांख्यिकीय रूप से नगण्य रहा। दरअसल भारत में सफेद चावल और मैदे की खपत बढ़ रही है, जबकि फाइबर और सब्जियां थाली से घटती जा रही हैं।
स्टडी का नेतृत्व करने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के प्रोफेसर विमल करानी कहते हैं कि भारत में खानपान तेजी से बदल रहा है और कुछ लोग इसकी छिपी कीमत चुका सकते हैं। उनके मुताबिक किसी को देखकर नहीं कहा जा सकता कि उसमें ये जीन हैं, लेकिन सफेद चावल खूब खाने और फल-सब्जी कम खाने पर इनके खून में कोलेस्ट्रॉल ज्यादा मिलता है। हालांकि वे साफ कहते हैं कि जीन हमारी सेहत तय नहीं करते — फल, सब्जियां और दालें ज्यादा खाना सबसे ज्यादा जोखिम वालों को भी बचा सकता है। इसके बाद डॉ. वी. मोहन ने भी यही बात दोहराई कि थाली बदलकर जीन की प्रवृत्ति के बावजूद कोलेस्ट्रॉल काबू में रखा जा सकता है।
यदि आपको थाली में प्रोटीन की कमी पर हुए ताजा सर्वे के बारे में जानना है तो हमारा यह लेख भी पढ़ें। हालांकि एक जरूरी सावधानी भी है: शोधकर्ताओं ने माना कि यह संबंध सांख्यिकीय है, कारण-परिणाम साबित नहीं हुआ — इसलिए लंबी स्टडी अभी बाकी है। इस शोध की विस्तृत जानकारी यहां पढ़ी जा सकती है।






