गर्मी ने छीनी नींद, बढ़ा डेंगू का खतरा! लैंसेट रिपोर्ट में भारत को लेकर चौंकाने वाले खुलासे

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गर्मी ने छीनी नींद, बढ़ा डेंगू का खतरा! लैंसेट रिपोर्ट में भारत को लेकर चौंकाने वाले खुलासे
तस्वीर साभार: Forbes India, MediaOne News

बदलती जलवायु अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह सीधे हमारी सेहत पर असर डाल रही है, और इसका सबसे ताजा सबूत लैंसेट काउंटडाउन रिपोर्ट में सामने आया है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के नेतृत्व में तैयार इस रिपोर्ट में 146 शोधकर्ताओं ने 54 संकेतकों का आकलन किया है। हालांकि यह रिपोर्ट पूरी दुनिया के हालात पर बात करती है, लेकिन भारत से जुड़े आंकड़े सबसे ज्यादा चौंकाने वाले हैं, क्योंकि गर्मी, नींद और बीमारियों का बोझ यहां तेजी से बढ़ रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक 2016 से 2025 के बीच भारत में लोगों ने हर साल औसतन 10.6 हीटवेव दिन झेले, जिनमें से आधे यानी 5.3 दिन सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन की वजह से थे। वहीं, तेज चलने जैसी सामान्य बाहरी गतिविधि के दौरान भी लोगों को हर साल 2,600 घंटे से ज्यादा ऐसे तापमान का सामना करना पड़ा, जिसमें हीट स्ट्रेस का खतरा मध्यम या उससे ज्यादा था, और यह आंकड़ा 1990 के दशक के औसत से 200 घंटे से ज्यादा है। इसके बाद रात की गर्मी ने भी चैन छीन लिया, क्योंकि 2021 से 2025 के बीच ज्यादा रात के तापमान की वजह से लोगों की हर साल औसतन 64 घंटे की नींद खराब हुई, जो 1986 से 2005 के औसत से करीब तीन घंटे ज्यादा है।

लैंसेट काउंटडाउन रिपोर्ट में डेंगू-मलेरिया का बढ़ता खतरा

गर्मी का असर सिर्फ सेहत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने लोगों की कमाई पर भी सीधी चोट की है, क्योंकि 2016 से 2025 के बीच भारत में हर साल औसतन 193 अरब संभावित श्रम घंटे गर्मी की वजह से बर्बाद हुए, जो 1990 के दशक के मुकाबले 75 फीसदी ज्यादा है। वहीं, मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी बढ़ा है, क्योंकि डेंगू फैलाने वाले एडीज एल्बोपिक्टस मच्छर की प्रसार क्षमता 1951-60 के मुकाबले 84 फीसदी बढ़ गई है, और अब यह प्रसार की सीमा से ऊपर पहुंच गई है। इसके अलावा, मलेरिया के लिए अनुकूल महीनों की संख्या भी बढ़ी है, जिसमें प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरम के लिए 19 फीसदी और प्लाज्मोडियम विवैक्स के लिए 18 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

समुद्री तटों पर भी खतरा बढ़ा है, क्योंकि विब्रियो बैक्टीरिया के प्रसार के लिए अनुकूल भारतीय तटरेखा की लंबाई 1982-91 के मुकाबले 27 फीसदी बढ़कर 2025 में करीब 2,740 किलोमीटर तक पहुंच गई है। वहीं, वैश्विक स्तर पर भी पेरिस समझौते के बाद गर्मी से जुड़ी मौतों में करीब 36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, और अकेले 2023 में 7.1 लाख मौतें गर्मी से जुड़ी थीं। रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन को वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल मानने की अपील की गई है। सस्टेनेबल लाइफस्टाइल अभियान की खबर भी पढ़ें।

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