बच्चों के मोटापे पर 7 देशों की बड़ी स्टडी! BMI ने अब तक जो छिपाया, वो जानकर चौंक जाएंगे

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बच्चों के मोटापे पर 7 देशों की बड़ी स्टडी! BMI ने अब तक जो छिपाया, वो जानकर चौंक जाएंगे
फोटो: criarconsentidocomun.com; findmykids.org (प्रतीकात्मक)

दशकों से वजन नापने का सबसे आम पैमाना BMI रहा है, लेकिन अब वैज्ञानिक कह रहे हैं कि यह पैमाना पूरी सच्चाई नहीं बताता। बच्चों में मोटापा की सही पहचान के लिए एक नई परिभाषा सामने आई है, जो सिर्फ वजन नहीं, बल्कि सेहत के असली असर को भी देखती है। ऑस्ट्रेलिया के मर्डोक चिल्ड्रन्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (MCRI) ने सात देशों के 7.86 लाख से ज्यादा लोगों के आंकड़ों पर इस परिभाषा को परखा है। यह शोध जर्नल eClinicalMedicine में 6 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित हुआ है।

बच्चों में मोटापा: नई परिभाषा में आंकड़े आधे से भी कम

स्टडी में सात देशों के 7,86,557 प्रतिभागियों के आंकड़े देखे गए — बचपन से बुढ़ापे तक ‘क्लिनिकल मोटापे’ के फैलाव पर यह पहला बड़ा अध्ययन है। नतीजे चौंकाने वाले थे — नई परिभाषा में बच्चों और किशोरों में क्लिनिकल मोटापा सिर्फ 2.1% से 4.9% तक मिला, जबकि BMI के पुराने पैमाने से 7% से 10.8% तक के बच्चे मोटे ठहराए गए थे।

लैंसेट कमीशन की नई परिभाषा सिर्फ वजन और लंबाई के अनुपात पर नहीं टिकती। इसमें देखा जाता है कि अतिरिक्त शरीर चर्बी के साथ मोटापे से जुड़ी बीमारियों के लक्षण या रोजमर्रा के कामों में दिक्कत भी मौजूद है या नहीं। यानी, जिसका BMI ज्यादा है लेकिन सेहत ठीक है, उसे क्लिनिकल मोटापे की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। स्टडी की प्रमुख शोधकर्ता डॉ. डेनियल लॉन्गमोर कहती हैं कि BMI पूरे देश की तस्वीर के लिए उपयोगी है, लेकिन किसी एक व्यक्ति की असली सेहत नहीं बताता। वहीं, वरिष्ठ शोधकर्ता डेविड बर्गनर के मुताबिक नई परिभाषा से डॉक्टर बेहतर फैसले ले सकेंगे, जिनमें वजन घटाने वाली दवाओं और डाइट की सलाह भी शामिल है।

भारत के लिए भी यह स्टडी अहम है, क्योंकि यहां बच्चों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026 के मुताबिक भारत में करीब 4.1 करोड़ बच्चे पहले से ही अधिक वजन या मोटापे से जूझ रहे हैं। इसके जवाब में ICMR ने पैकेज्ड खाने पर साफ लेबलिंग, बच्चों को निशाना बनाने वाले जंक फूड विज्ञापनों पर रोक और स्कूलों में सेहतमंद खाने का रोडमैप पेश किया है। ऐसे में नई परिभाषा भारत के डॉक्टरों को तय करने में मदद कर सकती है कि किन बच्चों को तुरंत इलाज चाहिए। सेहत से जुड़ी और भी रिसर्च खबरें यहां पढ़ें।

हालांकि एक सावधानी भी है — यह क्रॉस-सेक्शनल विश्लेषण है, इसलिए कारण और असर का पक्का नाता नहीं बताया जा सकता। साथ ही, डेटा में लैंसेट परिभाषा के सभी मानदंडों की पूरी जानकारी नहीं थी, इसलिए आगे और लंबे अध्ययन जरूरी होंगे। दरअसल, संदेश साफ है — वजन का सिर्फ एक पैमाना कभी पूरी कहानी नहीं बताता, और बच्चों की सेहत का आकलन पूरे शरीर और रोजमर्रा की जिंदगी के संदर्भ में होना चाहिए। (स्रोत: मेडिकलएक्सप्रेस)

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