देश में डायबिटीज, दिल की बीमारी और मोटापे की चर्चा तो हर रोज होती है, लेकिन मणिपालसिग्ना हेल्थ इंश्योरेंस की एक नई रिपोर्ट ने सेहत के ऐसे खतरे की ओर इशारा किया है — ‘हेल्थ डेट ट्रैप’। इस रिपोर्ट के मुताबिक, शहरी भारतीयों की सबसे कमजोर कड़ी उनकी शारीरिक या मानसिक सेहत नहीं, बल्कि उनकी वित्तीय सेहत है। दरअसल, 41 प्रतिशत लोगों ने कहा कि आर्थिक लक्ष्य हासिल करने की दौड़ खुद उनके लिए तनाव और चिंता का बड़ा कारण बन गई है। यही वह चक्र है जिसे रिपोर्ट में ‘हेल्थ डेट ट्रैप’ कहा गया है — पैसे की टेंशन सेहत बिगाड़ती है, और बिगड़ी सेहत इलाज पर होने वाले खर्च को और बढ़ा देती है।
India Health Quotient 2026 नामक इस अध्ययन में 16 शहरों के 2,600 शहरी भारतीयों से सेहत के पांच आयामों — शारीरिक, मानसिक, वित्तीय, पेशेवर और सामाजिक सेहत — पर बात की गई। कुल स्कोर 100 में से 65 रहा। हालांकि, शारीरिक सेहत 68 अंकों के साथ सबसे आगे रही, वहीं वित्तीय सेहत सिर्फ 62 अंकों पर सबसे नीचे रही। वहीं सामाजिक सेहत को 66, और मानसिक तथा पेशेवर सेहत को 65-65 अंक मिले। इसके बाद के नतीजे और भी सोचने पर मजबूर करते हैं — 36 प्रतिशत लोगों ने कहा कि पौष्टिक खाना, सप्लीमेंट और हेल्थ चेकअप पर खर्च करना उनकी जेब पर भारी पड़ रहा है।
हेल्थ डेट ट्रैप: युवाओं और महिलाओं पर सबसे ज्यादा मार
रिपोर्ट के मुताबिक, यह बोझ सब पर बराबर नहीं पड़ता और शहरों में रहने वाले युवाओं की सेहत पर इसका असर सबसे गहरा है। 25 से 34 साल के युवाओं की वित्तीय सेहत सिर्फ 59 अंकों पर रही, जो शिक्षा लोन और करियर की शुरुआत वाले वेतन के बीच जूझ रहे हैं। वहीं महिलाओं का वित्तीय स्कोर 61 रहा, जबकि पुरुषों का 63। इसके अलावा 40 प्रतिशत लोगों ने माना कि तनाव और चिंता को संभालने की कोशिश उनकी शारीरिक सेहत पर असर डाल रही है। हालांकि, इतने ही लोगों ने यह भी कहा कि परिवार और दोस्तों के साथ कम समय बिताने की वजह से उनका काम या पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
रिपोर्ट ने यह भी दिखाया कि हेल्थ इंश्योरेंस इस जाल से बाहर निकलने में मदद कर सकता है। जिन लोगों के पास बीमा था, उनका वित्तीय सेहत स्कोर बिना बीमा वालों से 8 अंक ज्यादा रहा। वहीं मानसिक सेहत में भी 6 अंकों का फासला दिखा। दरअसल, रिपोर्ट का साफ संदेश यही है — सेहत और पैसा दो अलग-अलग मंजिल नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। इसलिए अपनी वित्तीय सेहत को भी उतनी ही गंभीरता से संभालना जरूरी है, जितना हम शारीरिक सेहत को संभालते हैं।






