बैंक की गलती पर अब मिलेगा पूरा पैसा! डिजिटल फ्रॉड पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, जानें नया नियम कब से लागू

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बैंक की गलती पर अब मिलेगा पूरा पैसा! डिजिटल फ्रॉड पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, जानें नया नियम कब से लागू
कोलाज: सुप्रीम कोर्ट भवन और डिजिटल फ्रॉड जागरूकता तस्वीर (स्रोत: प्रेस/सोर्स तस्वीरें) | डिजाइन: द फोकस वर्ल्ड

डिजिटल फ्रॉड मुआवजा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा सख्त रुख अपनाया है, जिससे बैंकिंग व्यवस्था में पीड़ितों के हक की लड़ाई को नई ताकत मिली है। अदालत ने साफ कहा है कि अगर किसी डिजिटल फ्रॉड या डिजिटल अरेस्ट के मामले में बैंक की ओर से जरूरी सावधानी बरतने में चूक साबित होती है, तो पीड़ित को कम से कम उतना मुआवजा मिलना चाहिए, जितना पैसा उसका डूबा है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने 29 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई की। दरअसल अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों में करीब 50 फीसदी की कमी आने के बावजूद इस साल अब तक पीड़ितों को करीब 800 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। इसके बाद पीठ ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के प्रस्तावित नियमों में मुआवजे, रोकथाम और संस्थागत जवाबदेही के लिए ठोस और लागू करने योग्य प्रावधान होने ही चाहिए। वहीं अदालत ने आरबीआई से अधिकृत वित्तीय संस्थानों की पूरी सूची भी अगली सुनवाई तक मांगी है, ताकि निर्देश सभी पर समान रूप से लागू हो सकें।

डिजिटल फ्रॉड मुआवजा के लिए आरबीआई के नए नियम क्या कहेंगे

अदालत ने कहा है कि वह पहले आरबीआई के प्रस्तावित केवाईसी संशोधन निर्देश, 2026 की जांच करेगी, और उसके बाद ही नियामकीय प्रक्रिया को आगे बढ़ने की अनुमति देगी। इसके बाद ये निर्देश 30 नवंबर तक अधिसूचित होने और 31 दिसंबर तक लागू होने की उम्मीद है। हालांकि अदालत ने यह भी सुझाव दिया है कि ग्राहक के सामान्य लेनदेन पैटर्न से अलग दिखने वाले संदिग्ध ट्रांजैक्शन को अस्थायी रूप से रोका जाए, साथ ही ऑटोमेटेड अलर्ट और जरूरत पड़ने पर भौतिक सत्यापन की व्यवस्था भी की जाए। वहीं म्यूल खातों यानी फर्जीवाड़े के लिए इस्तेमाल होने वाले खातों पर शिकंजा कसना भी अदालत की चिंता के केंद्र में रहा।

यह मामला ‘इन रे: फर्ज़ी दस्तावेजों से जुड़े डिजिटल अरेस्ट के पीड़ित’ शीर्षक वाली स्वतः संज्ञान कार्यवाही के तहत सुना जा रहा है, जिसका मकसद साइबर अपराधों के खिलाफ संस्थागत प्रतिक्रिया को मजबूत करना है। दरअसल डिजिटल अरेस्ट में ठग खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर पीड़ित को डराते हैं और पैसे ट्रांसफर करवा लेते हैं। हालांकि ऐसे मामलों में जागरूकता ही सबसे पहला बचाव है, लेकिन अदालत का यह रुख बताता है कि अब सिर्फ चेतावनी देना काफी नहीं होगा, बल्कि बैंकों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। साइबर ठगी से बचाव के तरीकों पर हमारी पिछली खबर यहां पढ़ी जा सकती है, जबकि अदालत की सुनवाई का पूरा ब्योरा द हिंदू की रिपोर्ट में उपलब्ध है।

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