अब अस्पताल की दवा भी बेअसर? ICMR की 1.6 लाख मरीजों वाली स्टडी ने उड़ाए होश

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अब अस्पताल की दवा भी बेअसर? ICMR की 1.6 लाख मरीजों वाली स्टडी ने उड़ाए होश
अस्पताल के वार्ड की प्रतिनिधि तस्वीरें (तस्वीरें: टाइम्स ऑफ इंडिया/इंडियन एक्सप्रेस; कोलाज: TheFocusWorld)

अस्पतालों में गंभीर संक्रमण के इलाज के लिए जिस दवा को अंतिम विकल्प माना जाता है, वही एंटीबायोटिक दवा बेअसर होती दिख रही है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के एक बड़े अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि 61.1% ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया संक्रमणों पर कार्बापेनेम दवाएं काम नहीं कर रही हैं। यह रिसर्च द लैंसेट रीजनल हेल्थ – साउथईस्ट एशिया जर्नल में प्रकाशित हुई है। इसके बाद डॉक्टरों और नीति निर्माताओं के लिए यह गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

यह अध्ययन ICMR के एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस सर्विलांस नेटवर्क के तहत देश के 20 टर्शियरी-केयर अस्पतालों में अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच किया गया। इसमें 1,59,336 अस्पताल में भर्ती मरीजों का डेटा खंगाला गया, जो 17.5 लाख से अधिक मरीज-दिनों के इलाज को दर्शाता है। इनमें से 27,283 मरीजों में संक्रमण की पुष्टि लैब टेस्ट से हुई, जिनमें 26,213 मरीज यानी 16.4% में ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया पाए गए।

एंटीबायोटिक दवा बेअसर होने पर कितना बढ़ा मौत का खतरा

अध्ययन में चार प्रमुख बैक्टीरिया — ई. कोलाई, क्लेब्सिएला निमोनिया, एसिनेटोबैक्टर बाउमनी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा — पर नजर रखी गई। नतीजे चौंकाने वाले थे: कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट ई. कोलाई संक्रमण में मृत्यु दर 24.4% रही, जबकि संवेदनशील संक्रमण में यह 17.3% थी। वहीं रेजिस्टेंट क्लेब्सिएला संक्रमण में 31.2% मरीजों की मौत हुई, जबकि सामान्य संक्रमण में यह दर 23.5% दर्ज की गई।

सबसे खतरनाक नतीजा खून के संक्रमण (ब्लडस्ट्रीम इन्फेक्शन) में देखने को मिला, जहां कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट एसिनेटोबैक्टर, स्यूडोमोनास और क्लेब्सिएला संक्रमणों में मृत्यु दर 46 से 51% तक पहुंच गई। इसके अलावा 85% से अधिक ब्लडस्ट्रीम संक्रमण अस्पताल से ही जुड़े पाए गए, जो अस्पतालों में संक्रमण-रोकथाम की जरूरत को रेखांकित करता है। रेजिस्टेंट संक्रमणों में इलाज का खर्च भी 1.1 से 2 गुना तक ज्यादा पाया गया, और यह आंकड़ा केवल जनऔषधि योजना की कीमतों पर आधारित है।

ICMR की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कामिनी वालिया ने कहा कि एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस अब दूर का खतरा नहीं रहा, बल्कि यह पहले से ही भारतीयों की जान ले रहा है। उनके मुताबिक इसका जवाब सिर्फ और ताकतवर दवाएं नहीं हैं, बल्कि बेहतर संक्रमण-रोकथाम, समय पर सही जांच और दवाओं का जिम्मेदार इस्तेमाल है। शोधकर्ताओं ने यह चेतावनी भी दी कि रेजिस्टेंस को मौत का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि बीमारी की गंभीरता और इलाज का समय भी नतीजों को प्रभावित करते हैं। अधिक जानकारी के लिए NDTV की रिपोर्ट और हमारी पिछली खबर एंटीबायोटिक के साथ मीठा खाने पर स्टडी भी पढ़ें।

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